जानिये! शांतिमय जीवन कैसे होगा

जानिये शांतिमय जीवन कैसे होगा

शांतिमय जीवन: एक स्वप्न या वास्तविकता?

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, शांति एक दुर्लभ वस्तु बन गई है। हम लगातार काम, दायित्वों और तनावों से घिरे रहते हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वास्तव में शांतिमय जीवन कैसा होता है? क्या यह सिर्फ एक स्वप्न है या इसे प्राप्त करना संभव है?

शांतिमय जीवन का अर्थ

शांतिमय जीवन का मतलब सिर्फ शोर-शराबा न होना ही नहीं है।

यह मन, शरीर और आत्मा में भी शांति का अनुभव करना है।

यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ आप तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों से मुक्त होते हैं।

आप आत्म-जागरूक, आत्मविश्वासी और जीवन के प्रति कृतज्ञ महसूस करते हैं।

शांतिमय जीवन प्राप्त करने के लिए टिप्स

यहां कुछ टिप्स दिए गए हैं जो आपको शांतिमय जीवन प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं:

1. अपने विचारों को नियंत्रित करें:

हमारे विचार हमारे जीवन को आकार देते हैं। नकारात्मक विचारों को दूर करें और सकारात्मक सोच पर ध्यान केंद्रित करें। आभार और कृतज्ञता पर ध्यान दें।

2. ध्यान और योग का अभ्यास करें:

ध्यान और योग मन को शांत करने और तनाव कम करने में मदद करते हैं। यह आपको वर्तमान क्षण में रहने और जीवन का आनंद लेने में सक्षम बनाता है।

3. स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं:

पर्याप्त नींद लें, पौष्टिक भोजन खाएं और नियमित रूप से व्यायाम करें। यह आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा।

4. प्रियजनों के साथ समय बिताएं:

मजबूत सामाजिक संबंध शांति और खुशी के लिए महत्वपूर्ण हैं। अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं।

5. दूसरों की मदद करें:

दूसरों की मदद करने से आपको उद्देश्य और संतुष्टि मिलती है। यह आपको अपने से बड़ी चीज से जुड़ने में भी मदद करता है।

6. प्रकृति में समय बिताएं:

प्रकृति में समय बिताने से तनाव कम होता है और मन शांत होता है। पार्क में टहलने जाएं, पेड़ों के नीचे बैठें, या बस ताजी हवा का आनंद लें।

7. क्षमा करें और आगे बढ़ें:

अतीत को जाने देना और दूसरों को क्षमा करना आपके मन को शांत करने में मदद करता है। यह आपको नकारात्मक भावनाओं से मुक्त करता है।

8. अपनी भावनाओं को व्यक्त करें:

अपनी भावनाओं को बोतलबंद न करें। अपने परिवार और दोस्तों से बात करें या एक जर्नल में लिखें।

9. अपनी सीमाओं को जानें:

हर काम करने की कोशिश न करें। “नहीं” कहना सीखें और अपनी सीमाओं का सम्मान करें।

10. वर्तमान क्षण में जिएं:

अतीत के बारे में चिंता न करें या भविष्य के बारे में बहुत अधिक न सोचें। वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करें और इसका अधिकतम लाभ उठाएं।

शांतिमय जीवन एक यात्रा है, मंजिल नहीं। रास्ते में उतार-चढ़ाव आएंगे, लेकिन इन टैग को ध्यान में रखकर आप अधिक शांति और संतोष प्राप्त कर सकते हैं।

आप चाहे तो नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके सब्सक्राइब करें अति प्रिया, अबिस्मरणिया ब्यख्यान सुनें और सबको सुनाएं। आप और समाज का जीवन धन बनाये, लाभ पाये।
https://youtube.com/@samadhan_bkopt?si=Y9o04smMtlv9gUEY

“ईश्वरीय ज्ञान से पाएं समाधान” ईश्वरीय विश्व विद्यालय में आपका स्वागत है। ये केवल व्यख्यान ही नहीं बल्कि ये दिल से निकली आवाज है जो आप के दिल तक जाएगी, क्योंकि ये समरसता, सरलता और उदाहरण से परिपूर्ण हैI अगर आपने पूरा वीडियो एक- एक कर सभी सुन लिया तो आप के दैनिक जीवन और व्यवहार में क्रांतिकारी परिवर्तन जरूर आयेगा। आप सभी से नम्र निवेदन हैं कि ये दिल की आवाज सभी के दिल तक पहुंचने में सहयोग करे जिससे हमारा समाज एक जिम्मेदार और ब्यावहारिक बने और सभी का जीवन धन्य हो।हमारा पूर्ण विश्वास है कि इस दिल की आवाज को आप सभी के दिल तक पहुंचने में सहयोग करेंगे। 🙏आप सभी को सहयोग के लिए धन्यवाद🙏

शांति! जानिये शांतिमय जीवन कैसे होगा

https://youtu.be/9V-R90W-AYg?si=pB1LYEQVKsMEnaA2

प्रतिलिपि

ओम शांति आज का हमारा विषय है

“शांति अर्थात मन को शांति कैसे

मिले शांति हम सभी आत्माओं का स्वधर्म है

इसलिए शांति सबको अति प्रिय है

जल का स्वधर्म शीतलता होता है व सद शीतल रहता है लेकिन जब परिस्थिति

में अर्थात आग के संपर्क में आता है तो अपना स्वधर्म खोकर गर्म हो जाता है लेकिन

जब पुन व आग से दूर जाता है तो अपने स्वध में टिक जाता

है उसी तरह से शांति भी आत्मा का स्वधर्म है वह सदैव

शांत रहती है लेकिन जब विकारों रूपी परिस्थितियों के रे में आ जाती है उसके

प्रभाव में आ जाती है तो मन अशांत हो जाता है और तब लोग कहते हैं कि हम शांति चाहिए

हमको शांति चाहिए शांति कोई बजार तो नहीं बिकता कोई लाक ली शांति व तो अपने अंदर है

उसको अंदर से जागृत करना है अब शांति भी दो तरह का होता है एक होता है

बाह शांति और दूसरा होता है अंतरिक्ष शांति बाह्य शांति माना बाहरी

परिस्थितियां जब उग्र हो जाती है शोर हो जाता

है तो आत्मा को अच्छा नहीं लगता और वो शांति की तलाश में पहाड़ों

पर नदी के किनारे पार्क में या किसी एकांत स्थान में

चले जाते हैं ताकि उनको शांति की महसूस

हो अब आंतरिक शांति अब आंतरिक

शांति को ये जो द विकार रू भूत है जब उनको

प्रभावित कर देते हैं तो मन अशांत हो जाता है

शांति दुर्लभ है सबको प्रिय

है और इसका प्रमाण यह है कि अगर तराजू की एक पढ़ने में धन वैभव रख दिया जाए और

दूसरे में शांति को रख दिया जाए तो शांति का पड़ा भारी होगा क्योंकि

सब जानते हैं कि उस धन वैभव के कारण ही तो अशांति आई है इसलिए सब शांति चाहते हैं और इसका

प्रमाण यह है कि कई राज्य रानिया

राजकुमार अपने महल वैभव

साम्राज पत्नी बच्चों को त्याग करके शांति की खोज में चले गए

उसमें गौतम बुद्ध जिनका नाम सिद्धार्थ था और राजकुमार थे उनकी शादी हुई

थी ध्रुव राजकुमार थे राजा भरथ हरी राजा थे मीरा रानी थी सबने शांति के लिए अपने

उन धन वैभव को छोड़ दिया त्याग कर दिया अब मन अशांत कैसे हो जाता इसका एक हम

लोग दृष्टांत लेंगे तो एक बार एक आदमी थे

उनकी पत्नी थी और एक 13 साल की छोटी सी

कन्या य उनका परिवार अा भरारा था संपन्न

लोग थे जीवन शांति में चल रहा था लेके समय समय

का चक्र चलता रहता है और एक दिन उनकी पत्नी बीमार हुई और शरीर छोड़

दिया व आदमी निल हो गया अब क्या होगा ये

परिवार कौन चलाएगा कौन देखेगा बड़ा ही अशांत हो गए दुखी हो

गए लेकिन उनकी छोटी सी कन्या ने धीरे धीरे अपने पिता का ख्याल रखने लगी

बाथरूम में नहाने जाने से पहले साबुन तेल तलिया आदि चेक

करती स्कूल जाने से पहले उनको नाश्ता बना कर के नाश्ता करा के जाती भोजन भी वही

बनाती घर की साथ सफाई देख बाल सब उसने धीरे धीरे करके संभाल

लिया घर संभल गया राहत मिली अशांति खत्म

हुई दिन बीतने लगे लेकिन समय का च कब क्या

होगा कोई नहीं जानता एक दिन वह कन्या बीमार

पड़ी और वोही शरीर छोड़ दि अब वो पिता

क्या करता अब उसके मन में आधी तूफान उठने लगे

अशांति बहुत विकराल रूप ले ली उन्होने सोचा कि पत्नी गई तो बच्ची ने संभाल लिया

अब बच्ची गई तो कौन संभालेगा क्या होगा उनको कुछ अच्छा नहीं लगता था ना खाना

ना पीना ना कोई काम धीरे धीरे बीमार रहने लगे दुबले हो गए कमजोर हो

गए एक दिन वो अर्ध निद्रा में थे तभी देवलोक पहुंच

ग वहां उन्होंने देखा छोटी छोटी परिया हाथ में दीपक लिए लाइन से कतार

से आ रही है बड़ा उनको अच्छा लगा और उने सोचा कि

काश हमारी बेटी भी इनके साथ होती कितना अच्छा र

अचानक उनकी नजर एक ऐसी परी पर

पड़ी जिसके हाथ में दीपक तो था लेकिन बुझा हुआ था इनके मन में संकल्प आया कि क्यों हम

इसके दीपक को जला वो माचिस लेकर गए मा माचिस की ली जलाए ही थे वो चौक पड़े ये तो

उनकी अपनी बेटी तब उन्होंने पूछा बेटी सबके दीपक जल

रहे हैं य तुम्हारा दीपक क्यों बुझा हुआ उसने कहा पिताजी

हमारे दीपक भी सब की तरह रोज जलते हैं लेकिन आपके दुख से जो आंसू निकलते हैं उसे हमारा दीपक

जाता अगर आप चाहते हैं कि हमारा भी दीपक और की तरह लता रहे तो आज से रोना बंद करे

मुस्कुराना शुरू कीजिए पिता मुस्कुराए आश्चर्य दीपक अपने

आप ल यह मन रूपी

दीपक दुख रूपी आंसू को बुझा देते हैं और

मन अशांत हो जाता है दुखी हो जाता है यह सारी

समस्याए अब हुई है अगर हम 100 साल पहले

जाए तो उन दिनों कोई भौतिक संसाधन

नहीं लोग प्रकृति की गोद में रहते थ लेकिन शांति में रहते

8:13थ घर में माताए बने रहती थी वोह हाथ का पंखा झेलते झेलते दम गहरी

8:21निद्रा में सो जाती थी ना उन दिनों पंखा था ना कूलर था ना फ्रिज था ना एसी था ना

8:27टीवी था कोई संसाधन नहीं था य तक बिजली भी बहुत बड़े बड़े शहर में ही हुआ

8:36कर चलने के लिए घोड़ा गाड़ी किसी किसी के पास एक साइकिल हुआ करती थी आज सारे वैभव

8:45हमको उपलब्ध है चलने के लिए मोटर साइकिल कार हेलीकॉप्टर जहाज फज कलर टीवी ी सारे वैभव संपन्न है

8:54अगर नहीं है तो शांति नहीं क्योंकि इन वैभव के प्रभाव से द

9:01विकार का हम पर प्रभाव पड़ जाता है और हम अशांत हो

9:08जाते हैं दुन हो जाते हैं और कहते भाई हमको शांति में रहने ये सब लेलो सारा हटा

9:13लो हमको शांति में [संगीत] र अब प्रश्न यह है कि

9:19भाई यह मन को अशांत करने वाले कौन है कौन

9:25सा ऐसा प्रभाव है जो मन को अशांति पैदा करता है तो मन के अशांति करने वाले कारण और उसका

9:33निवारण दोनों का साथ साथ हम चिंतन करेंगे कि उन कारणों का निवारण कैसे होगा और हम

9:40शांत स्वरूप बन जाए तो इसके लिए पांच कारण पहला है कामुक

9:49मन दूसरा है लोभी मन तीसरा है क्रोधी

9:56[संगीत] मन चौथा है कंजूस मन और पांचवा है

10:03चिड़चिड़ा मन ये पांच ऐसे प्रभाव है जो मन को अशांत कर देते हैं तो सबसे पहले

10:12काम तो हमारे आत्मा का स्वधर्म है

10:18पवित्रता लेकिन जब काम विकार उस पर हावी हो जाता है पकड़ लेता है तो हमारी दृष्टि

10:26ति सब बदल जाती है जब हम मंदिर के अंदर जाते हैं वहां सीता माता पर्वती माता काली

10:34माता दुर्गा माता की छवि देखते हैं मन श्रद्धा से भर जाता है उन्हे अपनी मां की

10:41छवि दिखाई देती है उनको हम प्रणाम करते हैं पूजा करते हैं लेकिन वही व्यक्ति जब

10:49मंदिर से बाहर निकलता है और सड़कों पर जो सिताए चलती है उनके प्रति उनका मन कामुख

10:57क्यों हो जाता है क्योंकि मंदिर में पवित्रता का वायुमंडल था और यहां विकारों

11:03के वायुमंडल में प्रभावित हो गए मन का मुख हो गया उग होगा अशांत हो

11:10गया इसलिए हम क्या

11:15करें निवारण है कि हम

11:21अपने मन को कैसे बनाए संयमी बनाए संयमित

11:30जीवन मन को शांत रखने में बहुत ही योगदान करता है संयम जिन्होंने भी अपना जीवन संयम

11:39में बिताया व महान हो गए तुलसीदास की पत्नी ने

11:47कहा कि काम से भोग काम से राम की तरफ जाइए

11:52और भोग से भगवान की तरफ जाइए उन्होंने समझाया

11:57फटकारा तुलसीदास महात्मा तुलसीदास बन कर के इतने

12:04बड़े ग्रंथ रामचरित मानस का रचना कर दिया य संयमित जीवन

12:10है इसलिए हमें अपने जीवन को संयम में रखना

12:17चाहिए एक बार एक राजा थे अच्छे राजा

12:23उनके सेनापति ने सैनिकों के लिया और दूसरे राज पर चढ़ई कर

12:30युद्ध हुआ उनका विजय हुआ और जब एक राजा दूसरे राज्य पर विजय पाते हैं तो वहां से

12:37धन संपन्नता सब लेकर के आते हैं कि राजा को हम सौगात देंगे यह हमारी

12:42[संगीत] उपलब्धि इसके लिए वहां कितनी अशांति फैलती है इसका ध्यान नहीं देती इसलिए बहुत से

12:50लोग कहते हैं कि हम रहे सुख में दुनिया जाए भाड़ में ये उचित नहीं है राजा के सामने दरबार

12:59में पेश किया गया तर तरह के हिरे जवाहरलाल सोने चांदी अंत में सेनापति ने कहा कि

13:06महाराज हम आपके लिए नया तोफा लाए राजा ु हो दिखाओ कौन सा तोफ

13:13ला उन्होने बहुत ही रूपवती सुंदरी कन्या को प्रस्तुत किया की यह आपके लिए

13:22हमला राजा देख देखते र मंत्र मुगत हो ग जब

13:28उनकी भंग हुई तुमने कहा काश हमारी मां

13:35इतनी सुंदर रहती तो आज हम भी इतने ही

13:42सुंदर यह है संयमित जीवन उन्होंने उस कन्या में अपनी मां की छवि

13:50देखी य सयम ऐसा हमें बिताना चाहिए ताकि हम शांत

13:58ूप में रह सके दूसरा है लोभी

14:05मन हमारा लोभ लालच स्वधर्म नहीं यह द

14:12विकार में से एक है जो हमको प्रभावित कर देता है कारण क्या

14:18है कि हम आज के समय में जो समय चल रहा है

14:24उसमें और और और की ु लगाते हैं और हो जाए

14:29और कितना इकठा करेंगे सोने का पहाड़ भी किसी को मिल

14:36जाए ऐसा ही और होता ब

14:41अच्छा यह नहीं सोचते जो और और है कितना और

14:47यह हमारे मन को अशांत कर देता है और हम

14:52बेचैन हो जाते हैं हम अर्थ के पीछे तब तक भागते हैं जब तक हमारी अर्थी ना निकल

15:01जाए इसलिए हमारी अर्थी निकले इसके पहले

15:06जीवन के अर्थ को समझना जरूरी और जीवन का अर्थ है

15:14परिवर्तन समय का चक्र चलता रहता है

15:19परिवर्तन जैसे झूला पर हम लोग झूलते हैं झूला आगे

15:26जाता है फिर पीछे जाता है अब कोई कहेगा कि झूला कहां है कभी आगे कभी

15:33पीछे चल रहा है चलता रहेगा जैसे हम चलते हैं कोई नहीं कह सकता

15:40कि हमारा दाए पार आगे चल रहा है कि बाया चल रहा है ये चलेंगे ना कौन आगे है कौन

15:46पीछे कभी दाया आगे कभी बाया आगे दाया ये ना समझे कि हम आगे हैं और बाया ये ना समझे

15:53कि हम पीछे हैं क्योंकि दाया पीछे आएगा बाया आगे जाएगा ये समय च चलता रहता है

16:01इसलिए अब क्या करें लोभी मन को संतृप्त बना संत संतृप्त

16:09का अर्थ होता है कि जैसे पानी है उसम हम चीनी डालकर

16:16घलते हैं तो चीनी घुलता जाएगा घुलता जाएगा लेकिन एक ऐसी अवस्था आएगी कि पानी भी

16:24रहेगा चीनी भी डालेंगे लेकिन घल नहीं सकेगा क्योंकि पानी को चीनी को घोलने के

16:31लिए उसका सामर्थ्य उसका पावर खत्म हो जाता है ऐसी अवस्था को संतृप्त अवस्था या

16:39संतृप्त घोल कहा जाता है व और नहीं घुला पाएगा अगर हमारा मन ऐसा हो जाए तो और और

16:48की बजाय बस बस बस बस हो गया नहीं नहीं बस ली हो बहुत से लोग भोजन करने

16:57बैठ चटनी दीज अचार दीजिए सलाद दीजिए सब्जी दीजिए पापड़ दीज सब लेकिन जो संतत रहते

17:05हैं संतुष्ट ते बस हो र हो अरे र हो गया

17:13कते यह है संतृप्त मन एक बार पंडित जी गए भोजन

17:22कर तो य लोभी मन का य आदत होता है जो उसके

17:28पास है उसका ध्यान उधर नहीं जाता जो नहीं है उधर जाता है उधर ही देखता

17:35है अरे भाई हमारे पास जो है उसम अगर संतुष्ट हो जाए तो अशांति खत्म हो जाएगी

17:42लेकिन नहीं जो नहीं है उधर ध्यान जाएगा तो पंडित जी भोजन करने बैठे परिवार संपन्न था

17:49बड़ी थाली में कई तरह की कटोरिया में तरह तरह के व्यंजन परोसे

17:55गए बूढ़ी माता खाना खिला रही थी वो बैठी थी और पापड़ का थाली उनके पीछे हो

18:02गया व देख नहीं पाई पंडित दे पापड़ तो आया

18:08नहीं थाली में इतने सारे यंजन है उससे उनको खुशी नहीं है पापड़ नहीं आया बार बार

18:15दृष्टि उधर जाती पापड़ नहीं आया अब प्रश्न

18:21था व मांगे कैसे मांग ब हो जाएगी पंडित जी मांग रहे और पापड़ लेना भी जरूरी है

18:28तो उन्होने यति निकाला कहा की माता जी जब मैं आ रहा था यहां भोजन के लिए तो रास्ते

18:36में बहुत बड़ा सांप मिला अच्छा हा माताजी और उस साप की लंबाई इतनी थी समझ की यहां

18:43से लेकर के पापड़ की थाली त तब माता ने घूम कर दे पंडित तो पापड़

18:50देना भूल ही गई ली पा ये लोभी मन इसलिए लोभ मन को संतृप्त

18:59बनाए संतुष्ट बनाए तो हमारा मन अशांत होने से बच

19:06जाएगा तीसरा है क्रोधी मन

19:12क्रोध क्रोध एक ऐसी आग है जो पहले क्रोधी को जलाता है बाद में दूसरे को प्रभावित

19:20करता है जैसे माचिस की ली जलाएंगे व पहले खुद जलेगी त दूसरे को जलाग

19:29उसी तरह से क्रोधी मन ऐसी आग पैदा करता है कि मन अशांत हो जाता है बेचैन हो जाता है

19:37परेशान हो जाता है यहां तक कि दो मिनट का क्रोध दो दिन तक अशांत रखने के लिए

19:44पर्याप्त होता है इसलिए इसके लिए क्या करें इसके लिए

19:51क्षमाशील बने क्योंकि क्षमा ऐसा पानी है

19:57जो क्रोध को भस्म कर देता है क्षमा से क्षमा कर दीजिए

20:03खत्म अरे शिशुपाल को श्री कृष्ण ने 99 गलतियों के लिए क्षमा कर दिया तो क्या एक

20:10सास अपने बह के नौ गलतियों की क्षमा नहीं कर सकती अरे ठीक है नौ ना कर तीन तो कर

20:15सकती है ना अच्छा तीन भी ना करे एक गलती को क्षमा कर सकती है ना क्षमा इसलिए कहा

20:22कि क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पा छोटा कौन जो नासमझ है बड़ा कौन जो समझदार

20:30है जो ना समझ तो गलती करेंगे लेकिन जो समझदार है उनको क्षमा करना चाहिए अगर

20:37क्षमाशील बन जाएंगे य क्रोध का भूत उतर जाएगा और मन शांत स्वरूप हो

20:47जाएगा इसके बाद चौथा रा हु चौथा चौथा है

20:55कंजूस बहुत से लोग है कंजूस होते प्रश्न कंजूस कौन है भास

21:03कूस तो कुछ लोग आराम से कह देंगे जो दूसरो को खर्च नहीं करते वही कूस लाक ऐसी बात

21:10नहीं कंजूस वो है जो दूसरो को खर्च करेंगे ही नहीं अपने ऊपर भी खर्च नहीं

21:17करते वो कंजूस और परमात्मा तीन को कभी माफ नहीं

21:23करते एक तो उनको जो बाबा की बन ग ब्रह्मा कुमार

21:29कुमारिया बन जो संत बन गए और उसके बावजूद दुराचार करते हैं

21:36परमात्मा उनको माफ नहीं करते दूसरा न्यायाधीश जो न्याय की कुर्सी पर बैठकर

21:44अन्याय करते हैं परमात्मा उनको भी माफ नहीं करते और तीसरा परमात्मा ने जिनको धन

21:51दिया संपदा दिया साधन दिया और उसका ना तो उपयोग करते हैं और श्रीमत पर सफल करते

21:59तो धन की तीन अवस्था भोग दान या तो

22:05नष्ट अब कौन सी अवस्था हम चाहते हैं भाई अगर हम धन का उपयोग नहीं करेंगे उसका

22:13दान भी नहीं करे तो होगा क्या होगा इसलिए कहा कि किसी की दब ही धूल में किसी का चोर

22:19चुराए और तो किसी का राजा खा इसलिए समय रहते हम उसका उपयोग कर लेते

22:28एक दादाजी जैसे बहुत सारे भाई बहन जो पुराने

22:36कपड़े हो जाते हैं तो उनको अच्छे से धो रख देते होले के दिन

22:42पने क्यों जानते होली पड़गा कपड़े खराब होंगे चलो तेमाल करले तो उसी तरह से

22:50दादाजी के पास फटा पुराना बेस और जब बाजार जाते थे उसको

22:56प फटा पुराना ही र संभ्रांत थे संपन्न थे एक दिन जा रहे थ रास्ते में एक लड़का मिल

23:04गया दादा जीी कहा जा रहे त बच्चे बाजार जा रहा सब्जी लाने ठीक हैय फटे पुराने कपड़े पन कर जा

23:11रहे है तो बच्चे समझते नहीं हो ये जो सब्जी वालिया है ना बड़ी चालाक होती है

23:17अच्छे अच्छे कपड़े पहन कर जाने पर सब्जिया महंगी देती है इसलिए मैं पुराना जाता हूं

23:24सस्ती मिल जा तो ब ने कहा दादा जी पुराने कपड़ों पर

23:30सब्जी सस्ती मिलती है ना एक कटोरा लेकर जाइए सब्जी फ्री में मिल

23:36जाएगी तो यह कंजूस मन उन रखता है अशांत करता है और शांत रहने

23:45नहीं देता क्योंकि वो धन को बटोरने में लगा रहता है धन को बटता

23:51है और पांचवा है चिड़चिड़ा बहुत सारे लोग होते हैं बात बात

23:58पर बिगड़ जाते हैं भर जाते हैं गुस्सा करते हैं तो कहते है कि इनका मन चिड़चिड़ा हो गया बड़े चिड़चिड़ी बात भी कहि है तो

24:06ये बोखला जाते है चिड़चिड़ा मन ये मन को सबसे ज्यादा अशांत करता है ये चिड़चिड़ा

24:13मन अब मन तो चंचल है वो तो उछल कुद करेगा

24:20हमें क्या करना है तो देखिए मन जो है भागता है कहां भागता

24:27है जहां उसको रस मिलता है जैसे आप सिनेमा हल

24:34में बैठ जाइए तीन घंटे की फिल्म कैसे बीत गई पता ही नहीं चलेगा मन एक मिनट के लिए

24:41विधर नहीं जाएगा क्योंकि मन उसम रम गया उसको रस मिल रहा है उपन्यास लेकर बैठ जा

24:47पढ़ जब तक वो खत्म नहीं होगा वो दूसरा कोई काम उ अच्छा नहीं लगेगा बस पढ़ते रहेंगे

24:53पढ़ते रहेंगे क्योंकि मन उसम रम गया है भागता कब है

24:59जब हम परमात्मा की याद में बैठते हैं उनके महावाक्य सुनने बैठते हैं उनसे

25:07संबंधित प्रवचन बैठने सुनते हैं मन भागता है ते से क्यों व रमता नहीं उसम रस नहीं

25:15मिलता अब प्रश्न य है की भाई य सबके साथ तो ऐसा नहीं होता बहुत

25:22सारी ऐसी आत्मा है जो बाबा की याम खो जाती है

25:28उनके महावाक्य बड़े ध्यान से सुनते हैं प्रवचन में उनको रस मिलता है मन ऐसा क्यों

25:34है तो ऐसा इसलिए है जैसे कोई तीन आदमी आपके घर गए आपने चाय

25:44बनाया एकही स एक मात्रा में पानी चीनी दूध सब डाला

25:50आपने तीनों लोगों ने चाय चुकी ली एकने च थ

25:56ज्यादा दूस ठीक

26:01ने कम है अब प्रश्न की मात्रा एकही किसी

26:07को ज्यादा किसी को कम किसी को सामान्य क्यों लगा व निर्भर करता है जीवा के स्वाद

26:14ग्रंथि के पोटेंसी के ऊपर इसके के स्वाद की पोटेंसी कैसी है उसके हिसाब से व

26:22कम उसी तरह से मन हमारा भागता है या मन है

26:28यह निर्भर करता है हमारे मन की क्वालिटी के ऊपर कि हमारा मन कैसा

26:35है जैसा मन रहेगा उसको वैसा ही रस मिलेगा

26:40प्रभु प्रेम रस में जो मन रम जाएगा दुनिया का कोई भी ऐसा रस नहीं जो उसको आकर्षित कर

26:48सके एकदम मस्त रहता है व्यस्त रहता है ऐसा

26:54कई सारे उदाहरण है और इसी के कारण बड़े ऋषि मुनि तप करके बहुत बड़ी शक्तियों को

27:02प्राप्त किया उन्होने तो ऐसे मन को

27:07हम बनाए ताकि वो सीधा रास्ता उल्टी तरफ ना जाए प्रभुता की तरफ जाए पशुता की तरफ जाए

27:16इसका जिक्र हम लोग पहले चिंतन में कर चुके अब किसी से पूछिए भाई आप बड़ी मेहनत

27:24करते हैं बड़ी भागदौड़ करते हैं क्या कहे बाल बच्चों के लिए कर रहे हैं कमाएंगे

27:32नहीं कठा नहीं करेंगे तो बाल बच्चों का क्या होगा क्योंकि वह नहीं जानते कि जिस धन के

27:39उपार्जन में व इतना मेहनत कर रहे हैं वह धन उनके बाल बच्चों के काम आएगा इसकी कोई

27:46गारंटी नहीं

27:52जैसे एक बार एक उद्योगपति बड़ा मेहनत करते उन्होंने बहुत

27:58संपत्ति कमाए और एक दिन बीमार हुए शरी

28:06छ यह तो किसी के हाथ में नहीं है ना वह अपने पत्नी के नाम से 300 करोड़ की

28:13प्रॉपर्टी छोड़ गया अभी कोई बच्चा नहीं था पत्नी और दो फि भी मेनत करते बाल बच्चों

28:20के लिए वो पत्नी उनके ही ा से शादी कर

28:26ली और धन पर अधिकार किसका हो गया ा का भी हो

28:31गया ना समय का चक्र चला एक दिन एक साल के बाद

28:37वह स्त्री भी अपना शरीर त्याग पूरा मालिक ड्राइवर बन गया अपने

28:45मालिक के चेंबर में बैठा था रिवाल्विंग चेयर पर सामने उसके मालिक का फोटो टंग हुआ

28:51था माला चढ़ हुआ था सोच रहा था कि अब तक मैं यही समझता था कि मैं अपने मालिक के

28:59लिए मेहनत कर रहा हूं लेकिन मुझे आज पता चला मालिक मेरे लिए मेहनत कर

29:08रहे यह है हमारी विडंबना ठीक है मेहनत करने में बुराई नहीं है धन कमाने मेंही

29:15बुराई नहीं है लेकिन उसके लिए इकट्ठा करने ये होगा वो

29:22होगा भविष्य हम नहीं जानते और इससे मन हमारा अंत रहता है ना

29:28भाई ड़ दू करेंगे तो उसम तो मन अशांत ही होगा शांति हमारी खो जाती है धन जरूर

29:36इकट्ठा हो जाता है लेकिन शांति हमारी हो जाती

29:42है य पाच हो गए अब अंत में चार सत्र

29:48फार्मूला को याद कर पहला है बंद दरवाजे को ना देखें खुले

29:59दरवाजे की तरफ देखे परमात्मा एक दरवाजा बंद होने से पहले

30:07दरवाजा पहले खोल देते हैं इसलिए इसमें हमको अशांत होने की जरूरत

30:12नहीं दरवाजा बंद हो गया क्या करें बंद दरवाजा मतलब क्या होता है बंद दरवाजा माना

30:18जो बातें बीत गई उन्होंने हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया

30:23उन्होंने हमारे साथ ऐसा किया उन्होंने हमारा इतना ले लिया यह बंद दरवाजा है क्या करेंगे उसको

30:31वापस लेंगे वो तो हो गया ना भाई वो हो चुका उसम हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते

उसके पीछे मन को अशांत रखे उन्होने ऐसा कर दिया अब तो करना दिया खुला दरवाजा रखे और उधर अपना ध्यान

लगाए जिधर शांति है प्रेम है स्नेह

है तो हमारा मन उग नहीं

होगा दूसरा तीन अक्षर याद रखें एल एम एल एल फर

लोड लोड माना भार एल एम

एल एम फार मत और एल फार लीजिए एल एम एल अर्थात लोड

मत लीजिए हम अपने बुद्धि पर इतना भार इकट्ठा

कर लेते हैं कि हम नहीं करेंगे तो कैसे होगा हम नहीं करेंगे तो उसका क्या होगा यह

हो गया इसका समाधान कैसे होगा अपने मन पर बोझ ले लेते

हैं और परमात्मा कहते हैं कि बच्चे अपने सारे बोझ हमको दे दो हम देते नहीं है लेने

वाले तैयार है हम देते नहीं है हम कुछ ना करें केवल एक्सचेंज

अलाद क्यों क्योंकि हमारे पास इच्छाओं का भंडार है जो असीमित है कभी खत

नहीं और परमात्मा की तरफ परमात्मा के पास सामर्थ्य वान सर्व सामर्थ्य वान है

लेकिन कोई इच्छा उनके पास नहीं है और हमारे पास इच्छा है सामर्थ्य कुछ नहीं हैम

सामर्थ कुछ नहीं है ये समझते है कि हम समथवा है वो भ्रमित है भूल में हम कुछ

नहीं है कई बार हम चर्चा कर चुके हैं इस शरीर का जो देह भान रहता है इसकी

औकात जब शरीर छूट जाता है जला दिया जाता है तो यह जो शरीर लाखों करोड़ रुपए के भवन

में रहता है मोटे दल के गद्दे पर सोता है महंगे महंगे कपड़े पहनता

है एक 2 रप के मटके में आ जाता है उस राह

को फूक मारी हवा में उड़ जाता है यही हमारी औकात इससे ज्यादा नहीं है एक फूक हम

बर्दाश्त नहीं कर सकते ये हमारी औकात लेकिन हमारा देह अभिमान हम नहीं करेंगे तो

कैसे होगा इसलिए अपनी सारी इच्छाओं को परमात्मा को दे दे और उनके सामर्थ्य को

अगर हम ले लेते हैं तो सदा खुशहाल रहेंगे और शांत स्वरूप में

रहेंगे ही है तो एक दो दो हो गया

तीसरा तीसरा है हम जान बूझ कर कोई भी गलत

कदम ना उठ कई बार हम जानते हैं कि कदम गलत है फिर

भी उठा देते हैं आगे बढ़ जाते परिणाम पछतावा अफसोस अशांति ही हमें हाथ लगती है

कोई भी गलत कदम ऐसा नहीं है जो हमें अच्छाई की तरफ ले जाए इस

जानबूझकर ऐसी गलती हम नहीं करें कि जो हमें अशांति की तरफ ले

जा एक बार एक राजा थे उनको कहानिया सुनने का बड़ा

शौक अब कौन दिन कहानिया सुनाए तो उने

युक्ति रख राज्य में ऐलान कर दिया कि जो हमको ऐसी

सुनाएगा जो कभी खत्म ही उनको मैं 00 र का इनाम य तब की बात है

जब द रुप में एक तोला सोना मिलता बहुत हो परे राज में बात फल ग लेकिन

लोगों ने सोचा कि भाई रामायण खत्म हो जाता है महाभारत खत्म हो जाता है बड़े बड़े वेद

शस्त्र खत्म हो जाते हैं ये जीवन ही खत्म हो जाता है और ऐसी कहा कौन स होगी खतम

नहीं होगी राजा ने तो बड़ा जटिल समस्या र फिर भी लोग आते थे चलो भाई ट्राई तो

करें कोई आधा घंटा एक घंटा पना घंटा दो घंटा सुनाते चले जा राजा को तो अच्छा मौका

था लगता कुछ नहीं था दिन भर पड़े पड़ी कहानी सुनते थे पैसा भी नहीं देना पड़ता

था हरे लगन रंग चोखा कते एक दिन एक किसान का बेटा था छोटा सा

था वो आया राजा के दरबार में कहा कि महाराज सुना है आपने ऐसी कहानी जो कभी

खत्म ना हो जो सुनाएगा उसको आप 00 इनाम दे हां तुम सुनाओ क्या सभी दरबारी हसने लगे

अरे बड़े बड़े महापुरुष आए थककर चले गए अब ये इतना छोटा बच्चा कहानी सुनाएगा

राजा राजा ने कहा कि ठीक है सुनाओ कोई बात नहीं तो कहा हम सुनाएंगे कहानी

कभी खत्म नहीं होगी लेकिन मेरा शत आपने शर्त रखा है हमारी भी शत है

बोलो तो कहा की जब तक हमारी खत्म नहीं होगी कहानी तब तक आप सिंहासन से खड़े नहीं हो बैठे ब सुना राजाने कहा तो ब ज समस्या दिया

भाई फिर भी कहा की छोटा बच्चा सुना आ घंटा घंटे में लाक हो जाएगा ठीक है तुम मंजूर

है कहानी शुरू किया कहा की गांव था छोटा सा गांव था

लेकिन दूर दूर तक कोई गांव नहीं था केवल खेत ही खेत और बड़े बड़े बगीचे बहुत सारे

एक बार गांव के लोगों ने राय किया इस बार धान की खेती करेंगे हम सब मिल सबने

धान की खेती की उपज बहुत अच्छी हुई और सारा धान ग्रामीणों ने एक जगह

इकट्ठा किया बहुत सारा धान इकट्ठा हो गया चिड़ियों ने

देखा उनकी तो दूर दृष्टि होती है भोजन क जा दूर से देख लेते चिड़िया इकट्ठी होने

लगी स हजार लाख द लाख करोड़ कई करोड़ चिड़िया इक हो गई चलो भाई

भोजन पर्याप्त है खूब भोजन करेंगे आनंद बहुत सारी चिड़या इकट्ठी

हो राजा ने कहा तब कहा कि एक चिड़िया उतरी दाना लिया उड़

गई दूसरी उतरी दाना लिया उड़ गई दसवी उतरी

पवी उतरी स में उतरी दना लिया उड़ गया उड़ गई तो राजा ने कहा कि रे भाई ये चिड़िया

ही उड़ाते रहोगे कहानी भी आगे बढ़ेगी कहा कि महाराज चिड़िया बड़ी भूखी है

भोजन उनके सामने है अगर बिना भोजन कराए हम कहानी आगे बढ़ा देंगे तो वो तो

भूखी र जाए ब पाप लगे इसलिए कम से कम भोजन तो कर लेने कहानी तो बढ़ेगी

बेगी तो राजा ने कहा फिर बच्चे ने कहा राजा ने कहा फिर बच्चे ने कहा

फ अब य फर फ करते करते दोपहर हो गया शाम हो

गया अब राजा को लगा की भाई तो बच्चा बड़ा गड़बड़ कर रहा है और मु के अंदर बेचैनी

महसूस हुई सिंहासन से खड़ा नहीं होरहा अचानक शाम हो गया रात होने को आ गया

अचानक सिंहासन से खड़े हो गए दरबार नहीं महाराज आप बैठे रहिए अरे

कितना उड़ागा उने उड़ाते उड़ते थक जाएगा

तब राज ने कहा कि नहीं तुम नहीं जानते बच्चा बहुत च एक तो सारी चिड़िया उने में सालो लग

जाएंगे लाख करोड़ च उते उते लग जाए और मान

लो उड़ भी गए तो बुलाना तो इसी के हाथ में है बलाले अ फिर तुको भूख लगेगी फर नया जाएगा

इसलिए मैं हार गया लो अपना द का इनाम और जा

छोटा बच्चा चला गया तो ये है हमारी मन की अशांत करने वाली बात तीन

हो गया चौथा चौथा है तर्क ना करें क्योंकि तर्क से विवाद

बढ़ता है और विवाद से अशांति फैलती है इसलिए हम तर्क ना करें कई लोगों की आदत

होती है किसी बात में क्यों कैसे आज भी बाबा ने कहा ना क्यों कैसे क्या करते रहते

हैं ये तर्क नहीं होना चाहिए ये बुद्धि में बैठाने की अगर हमसे बड़ा कुछ कहता है

उसको मानना चाहिए क्योंकि बड़े के पास अनुभव रूपी जो धन होता है वो कहीं स्कूल

कॉलेज में नहीं मिलता अनुभव से कोई बात कहेंगे और हमसे बड़े हैं तो हमारे लाभ के लिए ही कहेंगे ऐसा तो कहीं नहीं कि नुकसान

के लिए कहेंगे इसलिए बात मानिए सास ने कहा यू बहु ने कहा क्यों बात बढ़

गई विवाद हो गया लड़ाई झगड़ा हो गया इस तरह से एक आदमी ने कहा पत्नी से की चाय

बनाओ पत्नी ने कहा क्यों पति ने कहा हमें नहाना है तो पनीने

कहा की चाय पी जाती है की नहाई जाती है तो पति ने कहा कि जब तुमको य बात मालूम थी तो

पूछा क्यों हम आदि हो जाते हैं तर्क करने के लिए

इसलिए हमें तर्क नहीं करना चाहिए और अंत में हम यही कहेंगे कि मन को

शांत रखना है तो सबसे महत्त्वपूर्ण है कि हम शांति के सागर परमात्मा से अपना लिंग

जोड़ ले शांति की धारा प्रभावित होगी और हमारा अशांत मन शत हो जाएगा हम शांत

स्वरूप में हो जाएंगे इसलिए

कहा कि सुख दुख आते है जगत में जीवन है एक

गांव कहीं धूप कहीं छा खट्टे मीठे फल कम

के पाते हैं सब कभी उल्टे कभी सीधे पढ़ते अजब समय के

पाव कहीं धूप कहीं छ ओम

शांति

https://samadhan.techtunecentre.com/ https://techtunecentre.com

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top
Verified by MonsterInsights